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शाम हो चली थी मैं चाय बना कर अपनी बालकनी में इत्मिनान से चाय पी रही थी जो कि मेरी पसंदीदा शांत जगह है | कुछ फूलों के पौधे लगाए हुए थे और उनसे आती खूशबू वातावरण को सुगंधित बना रही थी । अचानक मेरी नज़र सामने के फ्लैट पर गई जो काफी समय से खाली था वो फ्लैट हमारे फ्लैट से साफ - साफ दिखाई देता था क्योकि बिल्डिंग की दूरी ज़्यादा नही थी परदे अगर ना हो तो खिड़की से पूरा घर देख सकते है | उस बिल्डिंग के तीन कमरे दिखाई देते थे एक हॉल , बीच का किचन और एक रूम मैं कभी गई नही उस बिल्डिंग में लेकिन देखने से लगता था 2bhk ही होगा उसमें कुछ हलचल दिखाई थी । मैने सोचा काफी दिनों से बंद है सफाई करने आये होंगे मैंने ज़्यादा धयान नही दिया और चाय पी कर अपने कामो में लग गई। अगला दिन वही सुबह के कामो में निकल गया । शाम मैं चाय पीने फिर बालकनी में आ गई मेरी नज़र सामने गई तो कुछ सामान दिखा कोई शिफ्ट हुआ होगा तभी किचन में एक 23 ,24 साल की लड़की दिखाई दी । सूट पहने हुए ,मांग में सिंदूर, हाथों में चूड़ियां वो हँस हँस कर पास में खड़ी एक महिला से बात कर रही थी। तभी मेरे कानों में आवाज़ पड़ी भाभी इधर आना मुझे हेल्प चाहिए मेर...
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पाँच दिन की छूट्टियाँ बिता कर जब ससुराल पहुँची तो पति घर के सामने स्वागत में खड़े थे। अंदर प्रवेश किया तो छोटे से गैराज में चमचमाती गाड़ी खड़ी थी स्विफ्ट डिजायर! मैंने आँखों ही आँखों से पति से प्रश्न किया तो उन्होंने गाड़ी की चाबियाँ थमाकर कहा:-"कल से तुम इस गाड़ी में कॉलेज जाओगी प्रोफेसर साहिबा!" "ओह माय गॉड!!'' ख़ुशी इतनी थी कि मुँह से और कुछ निकला ही नही। बस जोश और भावावेश में मैंने तहसीलदार साहब को एक जोरदार झप्पी देदी और अमरबेल की तरह उनसे लिपट गई। उनका गिफ्ट देने का तरीका भी अजीब हुआ करता है। सब कुछ चुपचाप और अचानक!! खुद के पास पुरानी इंडिगो है और मेरे लिए और भी महंगी खरीद लाए। 6 साल की शादीशुदा जिंदगी में इस आदमी ने न जाने कितने गिफ्ट दिए। गिनती करती हूँ तो थक जाती हूँ। ईमानदार है रिश्वत नही लेते । मग़र खर्चीले इतने कि उधार के पैसे लाकर गिफ्ट खरीद लाते है। लम्बी सी झप्पी के बाद मैं अलग हुई तो गाडी का निरक्षण करने लगी। मेरा फसन्दीदा कलर था। बहुत सुंदर थी। फिर नजर उस जगह गई जहाँ मेरी स्कूटी खड़ी रहती थी। हठात! वो जगह तो खाली थी। "स्कूटी कहाँ है?" ...
पापा आपका फोन है , कौन है बेटी ? राधेश्याम जी अपनी बहू दामिनी से पूछते हैं। वो लवली दी का फोन आया है । हाँ लवली बेटा , आज तुझे कैसे अपने पापा की याद आ गई , ओफ्फ हो पापा ! आप जानते ही ना कि जॉब के कारण व्यस्त रहती हूँ , क्या करूँ - घर बाहर दोनों ही संभालना है और विवेक भी मेरी घर में मदद नहीं करते ? अब आप ही बताइए, ऐसे में क्या फोन करूँ आपको ? दामिनी है ही आपको देखने सुनने के लिए, बेटी को कौन पूछता है ? बहू के आगे कभी मेरी भी सुन लिया करें आप ! अपनी बेटी की बात को सुन दंग रह गए,। राधेश्याम जी लवली के रग रग से वाकिफ थे , स्वार्थपरता भरी पड़ी है लवली में , हमेशा से ही लवली अपनी छोटी भाभी को जली कटी सुनाती और जलील करतीं । कहते हैं कि घर में स्त्री ना हो तो घर भूत का डेरा लगता है । राधेश्याम जी की पत्नी रीना असमय ही अकाल मृत्यु की शिकार हो गई थीं । लवली की शादी भी अकेले ही राधेश्याम जी ने की और बेटा राज की शादी भी । अब बताओ भी, किसलिए अपने पापा को फोन की हो ? दरअसल नवीन को अमेरिका जाना है आगे के पढ़ाई के लिए, चालीस लाख कम पड़ रहे , बाकी साठ का इंतजाम कर लिया है हमने ! पापा आप चालीस ...
मैं दौड़कर आता हू , और पूछता हु । क्या बात है पिताजी ? पिताजी - तूझे पता नहीं है, आज तेरी बहन आ रही है ? वह इस बार हम सभी के साथ अपना जन्मदिन मनायेगी । अब जल्दी से जा और अपनी बहन को लेके आ,हाँ और सुन... तू अपनी नई गाड़ी लेकर जा जो तूने कल खरीदी है... उसे अच्छा लगेगा मैं - लेकिन मेरी गाड़ी तो मेरा दोस्त ले गया है सुबह ही... और आपकी गाड़ी भी ड्राइवर ये कहकर ले गया कि गाड़ी की ब्रेक चेक करवानी है। पिताजी - ठीक है तो तू स्टेशन तो जा किसी की गाड़ी लेकर या किराया की करके ? उसे बहुत खुशी मिलेगी । मै - अरे वह बच्ची है क्या जो आ नहीं सकेगी? आ जायेगी आप चिंता क्यों करते हो कोई टैक्सी या आटो लेकर---- पिताजी - तूझे शर्म नहीं आती ऐसा बोलते हुए? घर मे गाड़ियाँ होते हुए भी घर की बेटी किसी टैक्सी या आटो से आयेगी? मैं - ठीक है आप जाओ मुझे बहुत काम है मैं जा नहीं सकता । पिताजी - तूझे अपनी बहन की थोड़ी भी फिकर नहीं? शादी हो गई तो क्या बहन पराई हो गई ? क्या उसे हम सबका प्यार पाने का हक नहीं? तेरा जितना अधिकार है इस घर में , उतना ही तेरी बहन का भी है। कोई भी बेटी या बहन मायके छोड़ने के बाद पराई नह...
रात के बारह बज रहे थे उसका फ़ोन आया "हेल्लो" किसी ने फुसफुसा-हट भरे लफ़्ज़ों में कहा। "हाँ, बोलो" उसने भी हौले से कहा। "सब तैयारी हो गई क्या, सुबह चार बजे की बस है।" "मैंने अपने कपड़ों का बैग तो पैक कर लिया है, पैसे और गहने लेने हैं।" "अपने सब डॉक्यूमेंट भी ले लेना, हो सकता है दोनों को नौकरी करनी पड़े, नया घर संसार जो बसाना है।" "ओके, मैं सब कुछ लेकर तुम्हें कॉल करती हूँ।" उसने सबसे पहले माँ की अलमारी खोली, और उसमें से गहनों का डिब्बा निकाला, अपने लिए बनवाया गया मंगलसूत्र बैग में डाला, अंगूठी और झुमके पहन लिए, चूड़ियों का डिब्बा उठाकर बैग में डाल रही थी कि माँ की तस्वीर नीचे गिर पड़ी। उसे याद आया माँ की बरसों की इच्छा थी सोने का चूड़ा पहनने की। मगर जब पापा का एरियर मिला था तो जो चूड़ा बनवाया गया वो माँ ने ये कहकर उसके लिए सम्भाल कर रख दिया था कि जब बिट्टू इंजीनियरिंग करके नौकरी लग जायेगा खूब सारे बनवा लूँगी। अभी तो तेरी शादी के लिए रख लेती हूँ, मेरी लाडो कितनी सुंदर लगेगी। उसने तस्वीर वापस अलमारी में रखी और चूड़ा बैग में रख लिया।...
ऑफिस से निकल कर शर्मा जी ने स्कूटर स्टार्ट किया ही था कि उन्हें याद आया.. पत्नी ने कहा था 1 किलो जामुन लेते आना.. तभी उन्हें सड़क किनारे बड़े और ताज़ा जामुन बेचते हुए एक बीमार सी दिखने वाली बुढ़िया दिख गयी.. वैसे तो वह फल हमेशा राम आसरे फ्रूट भण्डार से ही लेते थे.. पर आज उन्हें लगा कि क्यों न बुढ़िया से ही खरीद लूँ..? उन्होंने बुढ़िया से पूछा.. माई जामुन कैसे दिए.. बुढ़िया बोली.. बाबूजी 40 रूपये किलो.. शर्माजी बोले.. माई 30 रूपये दूंगा.. बुढ़िया ने कहा.. 35 रूपये दे देना.. दो पैसे मै भी कमा लूंगी.. शर्मा जी बोले.. 30 रूपये लेने हैं तो बोलो.. बुझे चेहरे से बुढ़िया ने.. " न " मे गर्दन हिला दी.. शर्माजी बिना कुछ कहे चल पड़े और.. राम आसरे फ्रूट भण्डार पर आकर जामुन का भाव पूछा तो वह बोला 50 रूपये किलो हैं.. बाबूजी कितने दूँ..? शर्माजी बोले.. 5 साल से फल तुमसे ही ले रहा हूँ.. ठीक भाव लगाओ.. तो उसने सामने लगे बोर्ड की ओर इशारा कर दिया.. बोर्ड पर लिखा था - मोल भाव करने वाले माफ़ करें.. शर्माजी को उसका यह व्यवहार बहुत बुरा लगा.. उन्होंने कुछ सोचकर स्कूटर को वापस ऑफिस की ओर म...
रजनी कुछ दिनों से महसूस कर रही थी कि जब वह अपने मोहल्ले से निकलती है और जब शाम को अपनी जॉब से मोहल्ले में वापस आती है तब उसे देखकर कुछ लोग कानाफूसी शुरू कर देते हैं। एक बार उसने ध्यान से सुनने की कोशिश की तो उनकी बातचीत में उसे अपने पति नीलेश का नाम सुनाई दिया। जबसे नीलेश की जॉब चली गई थी तब से वह घर पर ही एक कमरे में छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता था और खाना भी बना लेता था। उसकी मदद के कारण रजनी बिना टेंशन के अपनी जॉब पर चली जाती थी। इधर कुछ दिनों से उसे नीलेश के व्यवहार में कुछ बदलाव दिखाई दे रहे थे और साथ ही मोहल्ले के लोगों में कुछ कानाफूसी भी हो रही थी। तब एक दिन अचानक रजनी दोपहर के समय अपने ऑफिस से घर आ गई। उस समय नीलेश बच्चों की ट्यूशन ले रहा था। कमरे का दरवाजा हल्का सा बंद था। रजनी ने उसे हाथ से धकेल दिया और सामने का दृश्य देखकर उसके मन में घृणा और क्रोध उत्पन्न हो गया। उसका शक सही निकला। नीलेश एक छोटी बच्ची को अपनी गोद में बिठाकर उसके शरीर को गलत तरीके से स्पर्श कर रहा था। यह देखते ही रजनी गुस्से में उबल पड़ी और जोर से चिल्लाई-"शर्म करो, तुम्हें तो अपनी इस हरकत पर डूब मर...